Friday, November 17, 2017

ह्रदय तेरा कोमल कोमल


ह्रदय तेरा कोमल कोमल 

ह्रदय तेरा कोमल कोमल 
विचार उसमे प्रेमळ प्रेमळ 
निष्कपट ही तू मन में गोरी 
सौन्दर्य सबसे विभोर विभोर

मधुरतम  तेरी वाणी गोरी  
मन भी तेरा मृदल मृदल 
तन का भी और क्या कहे 
तुजसां ना कोई विमल फूल 

प्रेम अपार ही कणव जनसे 
सिर्फ हमसे विलग  दूर दूर 
परकाया प्रवेश न सच जानू 
मन में रहते बेसबर मजबूर 

भाति तुम इतनी क्यों मुझसे 
विरह में रहते विकल विकल 
अज्ञानी तू कितनी भोली 
ना जान पायी मन की सल  

हृदयता के कोमलतामे 
हमें मिला दो एक जिव सा 
बिना विलम्ब कस दो ह्रदयमें 
जैसे मैं तुजसे  अलग न था