Friday, November 17, 2017

रात ये कैसी रुकी हुयी


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रात ये कैसी रुकी हुयी

रात ये कैसी रुकी हुयी
खयालो में सिमट ती रही
सपने भी सभी रुके है
चाँद बदली में छुपा है

नजरे उठाकर देखा ज़रा
चेहरा तेरा क्यों मुरझा
हमसे कुछ ऐसी भूल हुयी ?
निगाहें क्यों चुरायी हुयी ?

गम ओ सारे चुज़ लेंगे
एक बून्द भी ना पलने देंगे
ऐसे गुमराह ना करो दिलको
नजरे ज़रा हम से मिलाओ

चमन के तारे बिछा देंगे
चाँद को सिने में रखेंगे
सारी दुनिया झिलमिलायेगी
ख़ुशी की  बाढ़ ना रुकेगी