Saturday, December 2, 2017

केशर दर्प

केशर दर्प 

केशर केशर दर्प में तेरे 
सैर भैर मै मृग विहरे 
रंग भी तेरा  गोरा गोरा 
जैसे रंग सुनहरा बिखरे 

गालो की हसी सुनहरी 

उसके रंग की है  साड़ी 
मन भी कैसा है बावरा 
लगता मेरी प्रिया प्यारी 

नयन तेरे विलोल  विशाल 
शांति का सागर धुंद किनार
नासिका भी चाफ़े कलि  
सुगंध पुष्पसे भरा विहार 

ओठोंकी जोड़ी ,जामकी चिरी 
अमृत घट की पेहेरे दारी 
मिठास साड़ी दुनियाकी 
एक  ही जगह कैसे  भरी