Thursday, March 8, 2018

मैं जो रास्ते पे चल पड़ी(मिना -८ )






मैं जो रास्ते पे चल पड़ी
मुझे मंदिरों ने दी निदा
मुझे मस्जिदों ने दी सज़ा
मैं जो रास्ते पे चल पड़ी

मेरी साँस भी रुकती नहीं
मेरे पाँव भी थमते नहीं
मेरी आह भी गिरती नहीं
मेरे हाथ जो  बढ़ते नहीं
कि मैं रास्ते पे चल पड़ी

यह जो ज़ख़्म कि भरते नहीं
यही ग़म हैं जो मरते नहीं
इनसे मिली मुझको क़ज़ा
मुझे साहिलों ने दी सज़ा
कि मैं रास्ते पे चल पड़ी

सभी की आँखें सुर्ख़ हैं
सभी के चेहरे ज़र्द हैं
क्यों नक्शे पा आएं नज़र
यह तो रास्ते की ग़र्द हैं
मेरा दर्द कुछ ऐसे बहा

मेरा दम ही कुछ ऐसे रुका
मैं कि रास्ते पे चल पड़ी

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My walk on thorny path

When I walked on path, temples ridiculed me,
masjid punished me, all made me money machine

breath mine never assuage, feet never get tired,
sighs mine I hold in grip, I ever failed to request

wound my can't splint, my sorrow never dies,
all disappoint on me, and I compel to endure,

All eyes frown on me, all faces full of despair 
what a fortune before me, full of all dense sad

My pain so flow in me, my asphyxiate so hold

नव्हती जाण वेडी तेव्हा (मिना-   )

हृदयात तू वसलीस तेव्हा, पंख मनीचे फडफडले,
कासावीस झाला जीव, अंतर अतीव व्याकुळले,
नव्हती जाण वेडी तेव्हा, तू कुठे अन मी कुठे,
हूणहुणले मनात सारखे, आर्त ओढ लपवू कुठे,

मन वेडे विषण्य झाले,स्वप्नांनी जग वेढले,
कुशीत तुझ्या स्वप्न झोपले,निरागस मनी लव हसले,
नव्हती जाणीव अल्प तेव्हा, पाकळ्या सार्या विस्कटतील ,
अचानक तू जाशील तेव्हा, सारख्या भटकत राहतील,

डोकावते तु अजून मनात, स्मित कळ्या उधळून,
पण अश्रू माझे ओघळतात, हुंदके सारखे दाबून,
क्वचित एखादा भाव उलटला, बांध फोडून होतो मोकळा,

कुणा ना दिसावे प्रेम कुठले, राहतो मी असाच व्याकूळला ,