Thursday, March 8, 2018

घरधनि के अलावा


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घरधनि के अलावा

यादे पुरानी है ज़िंदा अभी 
ना कोई अबतक फरक पड़ा नहीं 
जैसे थे हम वही है देहाती 
जीना वैसे ही कुछ बदला नहीं

वोट देनेका मौसम रहता सुहाना 
बार बार कभी ओ आता नहीं 
कुछ मिलजाती थोड़ी पूंजी 
गुजारा तब , अब गरीबी सही

घरधनिका देखके उतरा चेहरा
लगता कुछ काम मिला नहीं 
भूके रहनेकी ख़ुशी आज है 
विठ्ठल के लिए उपवास है सही 

 कपडे बर्तन है सब चमकीले सुन्दर 
कुटिया सजाई तुरकाती से बेहतर 
कौन कहेगा के गरीब है हम
सिर्फ नन्हे को कपडे अंग पर भाते नहीं 

आमिर हूँ मै , मेरी बस्ती है आमिर 
उपजाते धान आपकेलिए , पर गर्व नहीं 
वोट लेके लूटो सब कुछ धन हमारा 
पर ज़िंदा रेहनेके लिए दो सहारा 

जान देनेकी नौबत ना लाओ उनको 
घरधनि के अलावा हमारा कोई नहीं 
क्यों कृतघ्न हो जाती है तब सरकार 
यह राम राज वैसा बेकार तो नहीं