Monday, March 26, 2018

इल्जामें मुहोब्बत



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इल्जामें मुहोब्बत 

इल्जामें मुहोब्बत ना इतना करो 
इश्क ये शाबित ना करना पड़े 
इन कातिल निगाहो से लगता है डर 
ग़ुस्से से पूरा हमें  निगल ना जाए 

नशाये गुलामी भरे ये लब्ज 
बेहोशी के कदार पर छोड़ ना दे 
हुश्न की ये जालिम भरी नुमाइश 
सिर्फ ये मर्जी है आपकी थोड़ा होश तो रहे

हुस्न ने इतना जो जुल्म निभाया 
हमारी तलाश में हम खुद है 
मिठास दिल की तूने इतनी चुराई 
रुखा रुखा  तुमने बनाया हमें 


छेड़ दो ये तान मेरे दिल की
के तुम्हारे हुस्न में मै डुब ना जाओ
ये सुरते चाँद पर रोशनी की साया
बरसे हम पर इश्क माहुस  ना हो

रूठ  ना तो दिल का पैदाइशी हक़ है
जहा प्यार की फरमाइश ना हो
खूबसूरत रिश्ते टूटा नहीं करते
ओ तो मजबूती के बहाने ढूंढते है

जिंदगी गुलाम बन जाती है हुस्न पर
इश्क की फटी झोली भरते भरते
प्यास फिर भी रूखी रूखी रहती है
जैसे नदी के किनारे रहते है सूखे सूखे