Tuesday, April 3, 2018

कटी घट


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कटी घट

कटी घट वे लागे जल भरे
माथे पर एक अलग विराजे
कर भी दूजा विलग से धरे
यह नारी कवन राजस्थानी लगे

यह भार वह नाजुक तनु बहाये
फिर भी स्मित लाघवी मुखपर लाजे
यह सजा जो समझे जैसे खुषी
यह दुखमय तरीका बावनकशी

मुक्ति नारी की भाषा ना कोई बोले
हसत हसत वे अपना जीवन सीधारे
नथनी नासिका, कंगन पुरे कर भर
घुंगट मुखपर ना देखपाये कोई सुन्दर

यौवन ढकके कर्म करे अविरत
सौंदर्य उलझे  मन होता है रत
सलज्जता भारतीय नारिसे सीखे
यह तो गहना है कही भी ना दिखे

कर्णफूल चमकीले कान में लटके
मन गुटि कंगनसम कुछ विराजे
सुवर्ण मणि माला विशेष शोभे
जैसे कोई अप्सरा अवनिपर गमे