Sunday, April 8, 2018

पाकीजा मिनाकुमारिका मौत का फरमान


पाकीजा मिनाकुमारिका मौत का फरमान 

पाकीजा फिल्म मिनकुमारिके जीवन पर आधारित उनके पति अमरोही ने उनको तोहफे के तौर  पर बनायी गयी थी। जैसे शाहजहां ने मुमताज के लिए प्यारका तौफा दिया था, शायद ये मौत के बाद दिया ।  वैसे ही अलौकिक सुंदरी मिनाकुमारिके लिए अमरोहिने प्यार का तौफा दिया, मौत के पहले दिया ।

लेकिन पाकीजा फ़िल्मी गानो  की बनावट पर ज़रा गौर से नजर डालेंगे तो अमरोही के  प्यार का अहसास नजर आता है। मीनाकुमारी ज़िंदा थी इसलिए ऐसे गाने डालने पड़े होंगे। पाकीजा फिल्म की तुलना मुमताज के याद में बनाये गए ताजमहल से करके एक प्रकार का जानलेवा डर मिनाकुमारिके मन में  पैदा करनेमे पूरा था।  शायद यह एक धमकानेका खूबसूरत तरिका होगा । ऐसा लगता है की मीना  कुमारिको मौत के तरफ खीचनेकी बड़ी मीठा शाही मियाना  जैसा  लगता  है। यह मीठे  प्यारके  पीछे  यादगार बनानेके लिए मरना होगा।  मीनाकुमारी मरना नहीं चाहती थी। कितना मीठा जहर था ये।

दुनियाके प्यारको इस मिठे  जहर ने हरा दिया।

मिनाकुमारिके पहले दूसरे फिल्मो में इस तरह के गाने क्यों नहीं फिल्माए गए ?

हा ,  सभी यह जानते थे की मीनाकुमारी एक अलौकिक कलाकार है और उनके प्रति सभी के मन में दया , करुणा, आदर्श, सन्माननीय  का भाव है। उनके प्रति जो अफ़वाए फिल्म इंडस्ट्री में फैलाई जा रही थी वह सब गंधा  जाहिरात बाजी का नमूना सब जानते थे।  उनके विरुद्ध कुछ साजिश करना भी बड़े जोखिम का काम था।  उम्र के हिसाबसे शरीर थोड़ा मोठा  हो गया था।  लेकिन उनका अदाकारा का प्रेशर तोड़ना फिल्म इंडस्ट्री को बड़ा मुश्किल था।

पाकीजा के यह गानो की बनावट बड़ी होशियारी से मौत के और ढकेल नेका जैसे प्रतीत होता है।  क्यों ऐसे गानो  में बार बार ऐसा समझाया गया है के मीनाकुमारी जल्दी मरने वाली है।  क्या यह जुल्म करने जैसा प्रतीत नहीं होता ?

पाकिजाकि मरनेकी सीडी
१) शायद पाकिजाके पीछे का राज मिनाकुमारिने जानने के बाद पाकीजा को अधूरा छोड़ दिया होगा । बताने वाले कारण कुछ और   हो सकते है । 
२) धर्मेंद्र ने  मिनाकुमारिको घरसे दूर करनेके बाद आशा दिलाई।  कृतघ्न बर्ताव करके वह पूरी तरहसे टूट चुकी थी। सभी तरफसे दुखी  जिंदगी जिनेकी तमन्ना समाप्त होने लगी।  फिर  भी यादो में रोने के लिए जीना होगा उसे।
३)  उसी दौरान जानेमाने राजकीय नेता और अभिनेता पति पत्नी सुनीलदत्त और नरगिस इन्होने पाकीजा को पूरा करनेका आग्रह किया।  और फिल्म इंडस्ट्री का रुका हुवा रास्ता साफ़ कर दिया। और बीते  हुवे प्यार में रोनेके लिए भी अवसर नहीं दिया।  वह मीठी यादो में रोना  चाहती थी।   बचपनसे यही ख्वाइश लेके आयी थी वह।

मीनाकुमारी मरना नहीं चाहती थी। पर पाकीजा व्यूह अधूरा पड़ा , धर्मेंद्रने थोड़ा और पूरा किया ,  फ़िल्मइंडस्ट्री के राजकीय दबाव ने शायद सम्पूर्ण पूरा किया।  तब मिनाकुमारिने जीने की आशा छोड़ दिए होगी। वह मरना नहीं चाहती थी।

दुखी लोगो को मारनेके लिए कितना बड़ा व्यूह करना पड़ता है।

पाकीजा फिल्म के गाने ज़रा देखिये।
जैसे
१) डर है न मार डाले, सावन का क्या ठिकाना   ( सावन के पहले वह नहीं रही )
२) दिन हो गये हैं ज़ालिम, राते हैं कातिलाना 
३) आओ खो जाएँ सितारों में कहीं,  छोड़ दे आज दुनियाँ ये ज़मीं
४) ज़िन्दगी ख़त्म भी हो जाये अगर, ना कभी ख़त्म हो उल्फत का सफ़र
५) जानलेवा है मुहब्बत का समाँ आज की रात, ( धर्मेद्र का कृतघ्न बर्ताव )
५) शम्मा हो जायेगी जल-जल के धुआँ आज की रात 
६) आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे ( उसको लगता होगा इस संकट से बच जाएंगे )
७) चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो, हम हैं तैयार चलो ( धर्मेद्र का कृतघ्न बर्ताव के बाद उबग गयी थी )
८) कुछ दिन पहले मीनाजी कहती थी " मै मरना नहीं चाहती " १९६८ से उन्होंने शराब बंद की थी। 
९) क्या मिनाकुमारिका स्त्री प्राधान्य भूमिका पुरुष  फिल्मोके लिए धोका था ? 

क्या मीनाजी को इस फिल्म के पीछे का राज पता चल गया होगा इसलिए १४ साल तक मना किया।  शायद नरगिसने पाकिजाके लिए मनाया नही होता तो मीनाकुमारी जींदा रहती।  धर्मेद्र का कृतघ्न बर्ताव के बाद जीवन को उबग गयी थी, इसलिए पाकिजाके साजिस के लिए वह राजी होगयी होगी। 


जनम से दुःख में ढकेल ने के बाद , पूरा जिंदगी का दौर तन्हाई , दुःख के बाद ; इस तरह पूर्व नियोजित जैसी मौत, भारतीय फिल्म वालो के लिए लज्जास्पद है ।   इन दर्द देनेवालोंपर घृणा आती है और  उनका कल्याण हो ऐसी सब प्रार्थना करे ।